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रात ऐसी फागुनी...
March 25, 2016 |






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रात ऐसी फागुनी
खुला अम्बर
धुला उजला
शीश पर है चन्द्रमा
हॅंस रही, ताली बजाती
मधुमास वाली मधुरिमा!
मान में बैठी हुई तुम अनमनी
कब कहो आई यहाँ
रात ऐसी फागुनी !!

नत नयन देते निमंत्रण
सिमट क्यों दुहरी हुई
सम्पुटों में मोतियों सी
स्मिता ठहरी हुई
संकोच के स्वर सिंधु से पसरे
धड़कनें होने लगीं हैं गुनगुनी !
रात ऐसी फागुनी !!

तोड़ आये
हम हजारों बंदिशें
नीति औ' निर्देश की
सर्द पीली गर्दिशें
किस सोच में डूबी हुई
कुछ तो कहो
घट गई है रातरानी की महक
अब दसगुनी !
रात ऐसी फागुनी !!

उम्र बाक़ी चन्द्रमा की
है घड़ी
या दो घड़ी
कह रही
दीवार पर
चुपचाप ये लटकी घड़ी
डूब जाएगा
गगन की झील में
कर अनसुनी !
रात ऐसी फागुनी !!

सलवटों से भर न जाए
ये चंदेरी शाल
सिमटनों में सिमटता
रेशमी रूमाल
है भरा दर्पण दरारों से
बड़ी हैं चूड़ियाँ कलाई से
बात लगती असगुनी !
रात ऐसी फागुनी !!

झर रही है सूख कर
मेंहदी हथेली की
चाँदनी को ढँक रही
झुर्रियाँ हवेली की
नयन भर कर देख लो
नवला सुहागिनी
रात ढलती जा रही है
फागुनी !
रात ऐसी फागुनी !!


KissaKriti | रात ऐसी फागुनी...
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