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ज़िन्दगी रिटर्न्स...
April 11, 2017 | Jyotsna Kalkal






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आज फ़ुरसत के पल निकालकर
बैठी हूँ खुद को संभालकर
छानती हूँ ख्यालों की अलमारी
बड़ी सी सांस ले मुस्कुराती हूँ
कुछ को करीने से सजा कर रखती हूँ,
कुछ पुरानी करंसी सा
बेकार समझ हटाती हूँ ।
अनुभव थोड़े अच्छे थोड़े खराब हैं
सबक मगर सारे बड़े लाजवाब हैं
बीता कल सही सही नापकर
गलतियाँ, नादानियाँ पल्लू से ढाँप कर
कान पर पेंसिल चढ़ा,
होठों में स्केच पेन दबा,
नए दायरे बना रही हूँ
गौर से लाइन खींचकर
ज़रा जोड़ तोड़ करती हूँ
हौले से आँखें मींचकर ।
शाम ढले बालकनी से
देखती हूँ नज़र भरकर
बड़ी सी लाल बिंदी
आसमान के माथे पर ।
उँगलियाँ फिराकर निहारती हूँ
उसकी सुंदर गोलाई
छूती हूँ यूँ का यूँ
घुमाकर कलाई ।
ढालना चाहती हूँ
यही पूर्णता जीवन में
थोड़ी सी ढील भी देती हूँ
फिर उधेड़बुन में ।
जीने को हासिल
खूबसूरत संसार है
बड़ा ही अहम मगर
ये स्वयं से साक्षात्कार है ।
मैं खुद ही लेखक,
खुद कलाकार हो रही हूँ
इस बार मगर निर्देशक
ज़रा समझदार हो रही हूँ ।
बोझिल सी पलकों पर रखती हूँ
कॉफी के प्याले की गरमाहट
सितारोँ भरी काली चुनरी सरक कर
ला रही है उजाले की आहट ।
मैंने भी समेट लिए हैं
कुछ रस्मो रिवाज़,
थोड़ा सा समाज
बन्द डिब्बों में भरे हैं
चुटकी भर कल, ढेर सारा आज ।
कुछ रंग फाग वाले
पन्नी में बचे हुए,
दो चार सपने
पलकों की तार पर टँगे हुए
सुनहरी किरणों में लपेटकर
उम्मीदों के अंश
तैयार हूँ लिखने को
उम्र के रुपहले पर्दे पर
-ज़िन्दगी रिटर्न्स....


ज्योत्सना कलकल
***

Likes (0) Comments (1)

Mukhtiar Singh
Nice Poem


KissaKriti | ज़िन्दगी रिटर्न्स...