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प्रेम
April 20, 2017 | Ankit Tiwari






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शब्दों में अन्तर्गुम्फित प्रेम,
चाहोगे तो ही पाओगे।
यह है भाव समर्पण का,
नहीं पशुता और बर्बरता का।
तुमने लिया वैज्ञानिकता को,
उपलब्धि मिली दो कौड़ी की।
विश्लेषण,तोड़फोड़ प्रकृति पे हमला,
खोज न पाए सुंदरता को तुम।

सौन्दर्य का तिरोहण कर,
प्रेम कैसे पा सकते हो तुम।
तमस में रहकर तुमने,
प्रकाश का निर्णय करना चाहा है।
रोगग्रस्त होकर तुम,
स्वास्थ्य की परिभाषा लिखते हो।
ईर्ष्या द्वेष में जीकर फिर,
प्रेम की कविता पढ़ना चाहते हो।

शब्द अगर पढ़ भी लो तो,
भाव क्या ...समझ पाओगे तुम।
शब्दों में अन्तर्गुम्फित है जो,
वह प्रेम कंहा से लाओगे तुम।
फूल के टुकड़े तो कर दोगे,
सौन्दर्य कंहा से लाओगे।

सत्य का मालिक बनना चाहो तो,
व्यर्थ की ठोकर ही खाओगे।
दृश्य का विश्लेषण कर ,
अदृश्य कपाट तुम बंद किये ।
प्रकृति को नष्ट कर के तुम,
सौंदर्य प्रेम से वंचित हुए।

उपलब्धि तो हो जाये शायद,
आत्मोपलब्धि अंकुर न होगी।
बलात्कार तो होगा किन्तु,
प्रेम की वर्षा कभी न होगी।
विज्ञान का मार्ग बहुत लाये हो,
धर्म का भी लेकर तो आओ।

सौंदर्य को पाना है तो,
प्रार्थना भरा ह्रदय भी लाओ।
बीज से आरम्भ करो तुम,
धैर्य धारण करते जाओ।
फल की चिंता त्याग मनुज ,
निष्काम कर्म करते तुम जाओ।
शब्दों में अन्तर्गुम्फित प्रेम,
चाहोगे तो ही पाओगे।।

🙏🏻।।अंकित तिवारी।।🙏🏻

KissaKriti | प्रेम
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