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सूर्य बाला
April 26, 2017 | Yojna Jain






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चंचल तरणी,
मादक मन हरणी,
श्वेत किरणों का श्रृंगार किये,
रूप ओज अपने साथ लिए,
रजनी के श्यामल आँचल से,
निकल देखो आ रही है,
सौंदर्य प्रकाश फैला रही है!!

गौर वर्ण पर हलकी सी लालिमा बिखरी,
श्वेत तुहिन कणों से कुछ और निखरी,
हिमरंजित, हिमशिखरों को पार कर,
नभ पथ से नभ पर छा रही है,
रजनी के श्यामल आँचल से,
निकल देखो आ रही है!!!!

लक्ष्य शायद उसका हिम शिखरों के उस पार जाना,
स्वर्णिम किरणों के रथ पर हो सवार, शिखरों को छू पाना,
धीरे धीरे लक्ष्य पूर्ती की ओर अग्रसित वो,
विजय पथ पर जाती, पद चिन्ह छोडती,
श्रम की तपन से तपी, कभी अनल सी बन जाती,
और कभी बदलियों के बीच छुप छुप डोलती...

अब जरा ऊर्जा रहित हो, मन में कसक उसके जगी,
क्यों घर से निकल कर इतनी दूर आ मैं चली,
पर अब भी ऊष्मा सहित वो आगे बढती जाती है,
गौर वर्ण थोडा फीका पड़ा, लालिमा मद्धम हो आई,
हर्षित होती देख अपनी लघु होती परछाई.......

लक्ष्य समीप पहुँच ख़ुशी की लालिमा फिर छाई,
शिखर छू पाने की आस ने भर दी नव तरुनाई!!
सखी सहेलियों सबको दे कर विदा
दे वचन आऊंगी कल पुनः प्रभा,

लुप्त स्वसौन्दार्य समेट देखो हो रही,
परछाईयों में गम, अचल गिरी के उस पार,
वसुंधरा को दे विदा, अब इस सण खो चली
तिमिर के तम में पहले धूमिल, फिर इस तरह
ख़तम हो चली उसकी कहानी, टूटा उसका जादू,
रजनी के श्यामल आँचल में पुनः गयी समा
निशा के तम ने प्रभाव अपना लिया जमा
और उसके रूप का भ्रम जो था पला
सूर्यास्त होते ही यूँ टूट चला!!!!!!!

KissaKriti | सूर्य बाला
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