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April 12, 2017 | Jyotsna Kalkal






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कभी हाथों में ,कभी माथे पर
लोग तकदीर ढूँढते देखे
ग़ैरों से लकीरें पढ़वाकर
सपनों की ताबीर ढूँढते देखे
दुआ ख़रीदने को बेताब
कुछ रईस
दौलत सारी लुटा देने को
फ़कीर ढूँढते देखे
खाने को कुछ न मिला तो
गरीब के बच्चे
होटल के बाहर खाने की
तस्वीर ढूँढते देखे
दुकानों में खड़े पुतले
मुस्कुराते हैं सजे धजे
शीशे में से भीतर झाँकते
नंगे बदन चीर ढूँढते देखे
माँ के अंत समय भी
छुट्टी मिल न पाई जिन्हें
वसीयत लिखाने की खातिर
वजह गम्भीर ढूँढते देखे
तोड़कर हर बन्धन जो
बेताब थे दूर उड़ने को
थक गए तो अपनों की
पुकार वाली जंज़ीर ढूँढते देखे
अंधी सी इस दौड़ में
फ़ुरसत किसे यहाँ
नए नाम कमाकर फिर से हम
तन्हाई में पुरानी सी जागीर ढूँढते देखे

ज्योत्सना कलकल

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Yojna Jain
very nice


KissaKriti | ढूँढते देखे