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साँवरिया रे !
October 19, 2016 | Mohan Joshi






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साँवरिया रे ! साँवरिया ! दिल का करार सुन जा रे !

ये कैसी उलझन गुमसुम गुमसुम।
जैसे मैं हूं वैसे हो तुम।
कह दूँ किससे कैसी ठुमठुम।
हैं जाने कहाँ वो हो गई गुम।
रिमझिम बरसते सावन में
झाँवर झलक होलै झुमझुम।
ये किसके हवाले कर दिया।
सुख का संसार बता जा रे !
साँवरिया . . . . . . . . ।

तेरी आँखों में मेरी आंखों में
तेरी सॉंसों में मेरी साँसों में,
लगी है कैसी एक लगन।
ये मन में मिलन की एक ही धुन।
टूटे ना साथ ये तेरा मेरा।
बिखरे ना साँसों का बंधन।
भोले भाले इन नैंनों को,
अंसुओं का भार बता जा रे !
साँवरिया रे . . . . . . .।

है फिर से सावन का मौसम।
ये फिर से घटाएं घननघनन।।
कौंधी बिजली सूना आँगन।
ये पुरवा बहती सननसनन।।
आज फिजा ने फिर घे�¤ �ा।
आ कर के मेरा यह जीवन

हौलै हौले उन बैंनों को ,
कानों तलक पहुँचा जा रे !

साँवरिया रे . . . . . . . . ...।

KissaKriti | साँवरिया रे !
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