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काफ़िया-आली गैर मुरद्द्फ
November 14, 2016 | Alok Pandey






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मेरे वतन की तो है, हर बात ही निराली
है ईद भी यहाँ पर, और है यहीं दीवाली।

नवरात्र और रोज़े, यहाँ साथ साथ होते
मल्हार साथ गाते, हो साथ में कब्बाली।

हर जाति धर्म के हैं, मिल जुल के लोग रहते
हर काम मिल के करते, कोई नहीं सवाली।

पकवान साथ बनते हो खीर या सिवय्याँ
सोंणा यहाँ का हलवा, रोटी यहाँ रुमाली।

आतंक का कोई भी नहीं जाति धर्म होता
कुछ भी नहीं अलग है गुंडा हो या मवाली।

को'ई' बात हो अगर तो दोषी हैं सब बराबर
इक हाथ से कभी भी बजती नहीं है ताली।

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डॉ.राजीव जोशी
बागेश्वर।

KissaKriti | काफ़िया-आली गैर मुरद्द्फ
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