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आशा
January 5, 2018 | Om Fulara






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मेरी मन के कोने में
पड़ा एक बीज
आशा का
अंकुरित होने को आतुर
न जाने कब से
ढूँढ रहा है
प्रेम की उपजाऊ भूमि
मेरे इस मरुभूमि से निकल
दुनिया की सैर पर
भटकता रहा
हर गली और आंगन में
थक हार कर फ़िर समा गया
मेरे ही मन के कोने में
जाना जब हाल उसका
वह निरूत्तर
शान्त मौन असहज सा
बोला
यह मरुभूमि ही उत्तम
पड़ा रहूँगा हर पल ऐसे
मर गयी चाह अंकुरण की
देख आया हर गली
हर घर के आंगन को
नोच खाने को है आतुर
मेरी कहीं न एक चली
तुम्हारे सपनो के साथ
यूँही जी जाऊँगा
मिटते ही तुम्हारे
खुद मिट जाऊँगा
पर कभी न सोचूँगा अब
यहाँ से बाहर जाने की
बंदिशें बहुत हैं
दबे रहना है हर पल
अंकुरित होकर
कहीं कुचला न जाऊँ
इससे अच्छा सोया रहूँ
हर दिल में झाँक के देखा
घोर निराशा छाई है
मेरा तो अस्तित्व मिटने की
अब बारी आई है
शोषित पीड़ित दीन दुखी से
सम्पन्न सबल के दिल को
छूकर देख लिया
नहीं साहस न इच्छा कोई
मुझे अंकुरित करने की
ढूँढ रहा हूँ उस पल को
जब उठेगी कोई चिंगारी
तब में भी अंकुरित होकर
पुष्पित व पल्लवित होऊँगा
तब तक तुम ही मुझको
अपने अन्दर पलने दो
दुनिया की यह दीन दशा
मौन होकर सहने दो |

KissaKriti | आशा
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