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जीवन की चाह
April 24, 2017 | Ankit Tiwari






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की चाह में प्रतिपल,
भेद नही कर पाता हूँ।
कुछ करना तो चाहता हूं,
कुछ कर नहीं मैं पाता हूँ।।

रहकर विषैले कण्टक पर,
अमृत की नहीं चाह अब।
किन्तु जो पाना चाहता हूं,
वह भी नही पा पाता हूँ।।
चाह कहूँ या पागलपन अब,
भेद नहीं कर पाता हूँ।
कुछ हासिल करना चाहता हूँ,
कुछ छोड़ चला मैं आता हूँ।।

राग कहूँ या द्वेष इसे,
या जीवन का प्रतिलोभ इसे।
स्वार्थी और लोभी बनकर भी,
उसे हासिल नहीं कर पाता हूँ।।

अनिष्ट करूँ तो कैसे करूँ ..?
उस में भी मैं ...मुझ में भी मैं ।
कुछ फर्क नहीं कर पाता हूँ।।
जीवन में ढूंढा उसको,
मृत्यु में भी अंगीकार किया।
इतना होने पर भी,
स्वयं को ही प्रतिध्वनित सुना।।

पागलपन की हद कहूँ इसे,
या सिद्धावस्था अभिमान करूँ।
जो भी चाहूँ मैं खुद से,
उस से बढ़कर ही पाता हूँ।।
हूँ योग्य नहीं इस योग्य धरा पर,
क्षणभंगुर फिर भी इठलाता हूँ।
मान अपमान में पिसकर,
जीवन व्यर्थ गवाता हूँ।।

वो मुझमें है या मैं उसमें हूँ,
भेद नहीं कर पाता हूँ।
जीवन जीना चाहता हूं,
मुक्ति भी सदा मैं चाहता हूं।।

जीवन की चाह में प्रतिपल,
भेद नहीं कर पाता हूँ।
कुछ करना तो चाहता हूं,
कुछ कर नहीं मैं पाता हूँ।।

।।अंकित तिवारी।।

KissaKriti | जीवन की चाह
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