Login Sign Up Welcome
Guest




हाँ, वो घर ‘घर’ लगता था
April 13, 2017 | Poonam Matia






Link for Book



हाँ, वो घर ‘घर’ लगता था|

मैंने देखा था,
हाँ मैंने तो देखा था
शायद ‘तुम’
सोच भी न पाओ|
वो मूंह-अँधेरे उठना,
चूल्हा लीपना, या
अंगीठी जलाना,
तड़के ही शौच निवृत हो
सबके उठने से पहले नहाना,
टोक्नियाँ, घड़े ,पतीले भरना,
मन-मन में मंत्रोचारण,
आरतियों का बुदबुदाना|
संग-संग पूरा घर बुहारना,
रात के बचे बर्तनों को
चूल्हे की राख से माँज,
स्वयं पौंचा लगाना|
न–न मैंने नहीं किया|
बस देखा नानी ,दादी
मम्मी ,मामी, बुआ, चाची को|
चप्पल ,जूते नज़दीक न फटकने देती,
न खाने देती बिन नहाए कुछ|
काम नहीं कराती थीं,
खुद को ही झोंक देती थी|
दूध ,सब्जी-रोटी, मठ्ठा, दाल
सब मिल-मिल कर बनाती थीं|
चूल्हे की आग ठंडी होने तक
कुछ न कुछ पकाती थीं|
ठंडा हमे कहाँ खिलाती थीं,
अंत में ही पर खुद खाती थीं|
न , न! पल्लू तनिक न सरकता था,
लाली लिपिस्टिक न भी हों
संग पसीने की बूंदों के
बिंदिया ,सिन्दूर दमकता था|
चूड़ियों ,पाजेब की खन-खन से
पूरा घर खनकता था|
हाँ, वो घर ‘घर’ लगता था|
हाँ, वो घर ‘घर’ लगता था|......... Poonam Matia

Likes (1) Comments (1)

Poonam Matia
बहुत शुक्रिया .......आप सभी का (92)


KissaKriti | हाँ, वो घर ‘घर’ लगता था