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दादीजी
September 7, 2017 | Jyotsna Kalkal






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दादीजी

देखे ज़माने के रंग नए,
बाहर मुस्काए,भीतर सब सहे,
यादों के बगीचे को
चुपके चुपके,
आँसूओं से सींचे दादीजी।
शादी ब्याह या राशन कार्ड में
छपती सबसे ऊपर,
जरूरी सामान की लिस्ट में लेकिन,
सबसे नीचे दादीजी।
चेहरे थोड़े कम पहचाने,
आहट से पर सब कुछ जाने,
चौकीदार बनी घर की,
तेवर रखती गार्ड सरीखे दादीजी।
किसी दिन बेटे बैठें थाली लेकर,
वो रोटी खिलाये खुद सेंककर,
बाट देखती ,
मिट्टी के चूल्हे सी छत पर ,
बारिश में भीजे दादीजी।
दो सिरहाने बैठें,
दो पैंताने,
खटिया देखो बड़ी हो गई,
सिकुड़ सिकुड़ कर रह गई आधी,
रोज़ यूँ बीते दादीजी।
लगाकर अंगूठा बंटवारे का,
घर -खेत के काग़ज़ों पर,
अकेली बैठी,
बेंत से रेत पर,
आड़ी तिरछी लकीरें खींचे दादीजी।
झोली भर आशीष लुटाए,
नेह से सर पर हाथ फिराए,
पेंशन के फिर नोट निकाल,
बांटे नेग सभी के दादीजी।
कहानियां ढेरों सुनाती,
आज़ादी की लड़ाई,
जवानी के किस्से दोहराती,
बस दादा न लौटे सरहद से,
रह गई पीछे दादीजी।
चमकती हैं उसकी आँखें,
उन तमगों से कहीं ज़्यादा,
धूल झाड़कर पल्लू से जिनकी,
मन ही मन रीझे दादीजी।
कठपुतली सी सब कुछ माने,
न कहने के गए ज़माने,
पोते की सेल्फी में बैठी,
आँखें मींचे दादीजी।
बड़े यक़ीन से कह गए हैं
छोटे ताऊ जी,
मिल जाना,
इस बार,
अब की जेठ दुपहरी में,
दीवार पे दीखे दादीजी।

ज्योत्सना कलकल

KissaKriti | दादीजी
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