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जेल
July 5, 2017 | Surendra Arora






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" पिता जी मैं जा रही हुँ , क्या आप चलेंगें ? "
" बेटा, मेरी तबियत ठीक नहीं है और फिर दस बजने को हैं इतनी रात गए हमें घर की चिंता करनी चाहिए फिर तुम्हे तो कल भी जल्दी आफिस के लिए निकलना होता है ."
" पिता जी , आप उसकी चिंता न करें . आप चल सकते हैं तो चलिए वरना मैं तो जा रही हुँ स्टाप पर उनको लेने ."
" बेटा ! जमाना खराब है इतनी रात को बहू - बेटियां घर से नहीं निकला करती ."
" पिता जी ! प्लीज , अब जमाना बदल गया है . वे पति हैं मेरे , मैं तो जाऊंगीं उन्हें लेने ."
" बहू कहा न तुम नहीं जाओगी . भले घर की स्त्रियां देर - सवेर सिर्फ घर की चिंता करती हैं . रोहन आज पहली बार इतनी देर से नहीं आ रहा है . रोज का काम है उसका . वो तो रोज इसी टाइम घर आता है . तुम उसके खाने की तैयारी करो ."
" पिता जी ! जिद न कीजिये . गाड़ी है न मेरे पास . आपको पता है न कि खाने कि पूरी तैयारी मम्मी जी ने कर रखी है . उनके आने पर परोस मैं दूंगीं ."
" बहू ! जिद मैं नहीं तुम कर रही हो . कहा न तुम नहीं जाओगी ."
" अजीब मुसीबत है . ये घर है या जेल है . जहां हर जरा - जरा सी इच्छा के लिए भी गिड़गिड़ाना पड़ता है और वह भी पूरी नहीं होती . "
उसने पैरों को जोर से पटका . गाड़ी की चाबी को फेंका और अपने कमरे में बंद हो गयी!

KissaKriti | जेल
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