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'पखाँणों में नि जए'
May 18, 2017 | Mohan Joshi






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पखाँणों में नि जए भुली !
दरणों में खुटी, खस्स रडि जाली।।...

जी रौंना त्यार् ड्वाक् और डाल्।
ज्यौड जानरी ब्वजाँ क् जाल्।।
टाँन जी रौंन थुपुड गुभरों का,
गाजी बागुड कुकुड और बाल।।

जी रओ क्यवाँणि, पन्याणि-चुली।
पखाँणों में नि जए भुली !....

काँ काँ पुजै द्यौं त घा क् लोभ
न आराम कभैं कि के कौला लोग।
भम्म हली समई नि पाली
त साँसोवनि कसि ज्योंन रै पाली।।

कसि रौं घर-द्वार खुली?
पखाँणों में नि जए भुली !....

एक दिन तो उडि जाँनीं पोथीला
आपणाँ घोल कैं छट्ट छोडी।
फट्ट-फटाँङ जून फिर ऐंछ
अमूस क् बखत थोडी।।

कर नैं तु फिकर ठुली।
पखाँणों में नि जए भुली !

KissaKriti | 'पखाँणों में नि जए'
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