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उलझन
April 12, 2017 | Om Fulara






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जिन्दगी कभी कभी यूँ उलझ जाती है
कि पास आते आते खुशी भी रूठ जाती है
कर्तव्य और कर्म की राह पर चलते चलते
कितने कर्तव्य छूट जाते हैं
कुछ कर्तव्यों को निभाते निभाते
अपने ही दूर हो जाते हैं
मुश्किल होता है चयन करना
जब कुछ कर्तव्य जरुरी हो जाते हैं
किसे चुनें ये सोचते सोचते दिन बीत जाते हैं
इन्ही दिनों में कितने ही लोग दूर हो जाते हैं
इन्ही रूठे रिस्तो को मनाने में ही
जिन्दगी बीत जाती है
उलझन से शुरू होकर उलझन पर ही
जिन्दगानी खत्म हो जाती है

KissaKriti | उलझन
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