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क्या यही है मेरी पहचान
April 26, 2017 | Yojna Jain






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सच कितनी प्यारी बच्ची है वो. कहती है- आप ही मुझे ready करोगे, मुझे आपके हाथ से ही खाना खाना है. please मुझे पार्क ले चलो न.... 4 साल की बच्ची और इतना प्यार... बहुत समझदार भी है वो. उस दिन मेरे घर में घुसते ही पहले मुझे निहारा, ध्यान से देखा, फिर कहने लगी... हम्म... अच्छे हो आप. बहुत अच्छे हो... I like you!

बस ऐसे ही पता ही नहीं चला कब मुझे इस घर से, और खासकर भव्या से इतना प्यार हो गया. उसे उठाना, तैयार करना, उसका breakfast बनाना, स्कूल के लिए ready करना.

और फिर घर के और काम, टाइम का पता ही नहीं चलता... कोई इधर से आवाज़ लगाता, कोई उधर से, हेमा ये दे दो, हेमा ये कर दो.... ददूध, पानी, चाय, पूजा के बर्तन.... ऊप्फ्ह्ह! भव्या के स्कूल जाने के बाद थोड़ी सी शांति मिलती है...

भव्या को स्कूल के लिए तैयार करते हुए याद आता है – कैसे मम्मी मुझे दो छोटी बनाके स्कूल भेजती थी... कितनी उम्मीदें, कितने सपने थे मम्मी पापा के मुझे जुड़े हुए... पर क्या करें, में असम से हूँ ना... हमारी तरफ पढ़ाई तो है पर काम नहीं, भविष्य नहीं...

मैं बिलकुल ठीक हूँ यहाँ पे, सब मुझे बहुत प्यार करते हैं मम्मी चिंता नहीं करो – कहती हूँ जब मम्मी का फ़ोन आता है. और भव्या तो मुझे जान से ज्यादा प्यारी है... उसकी बातें बताती हूँ... उसने आज ये किआ, ये नया सीखा, आज मैंने उसकी पसंद की ये चीज़ बनायीं.... पर हाँ जब अकेले में मम्मी को याद करके रोती हूँ, या किसी की कोई बात बुरी लगने पे जब रात में सुबकती हूँ, वो नहीं बताती मम्मी को कभी.... उन्हें दुःख होगा न... वहां उन्हें नींद नहीं आएगी...

सोचती हूँ कभी कभी अपने बारे में, अपने भविष्य के बारे में भी... क्या ये ही जिंदगी है, कैसा भविष्य होगा...

सामने वाले घर में सिया के साथ एक बमुश्किल १२-१३ साल की नयी लड़की आई है... पता नहीं लोग क्यों ऐसा करते हैं... नेहा नाम है उसका... वो तो खुद ही बच्ची है, कैसे सिया को संभालेगी...... जब सिया को झूला झुलाती है, तब उसकी आखें इसी टाक में होती हैं की कब उसे मौका मिले झूलने का और कोई उसे कहीं देख न ले.... एक दिन सिया के मुह में अपने गंदे हाथों से ऐसे ही खाना डाले जा रही थी.... मैंने उसे प्यार से समझाया.. तो कहने लगी... ये नहीं खाएगी तो मुझे डांट परेगी न, इसलिए और फिर घर भी जाना है....

पर खैर, छोड़ो... भव्या को पार्क ले जाने का टाइम हो गया है. चलती हूँ अभी. फिर आके सबका खाना भी बनाना है...
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पार्क में आज एक नयी आंटी आ गयी.. मुझे भव्या के साथ देख पूछने लगी मेरे बारे में... तभी दीदी भी पार्क में आ गयीं..... आजकल वो ऑफिस आते ही, car park करके सीधे पार्क में आ जाती हैं भव्या के पास... उन्हें देखते ही भव्या मुझे छोड़ के उनसे चिपट गई. मैंने बुलाया तो भी नहीं आई... थोडा बुरा तो लगता है... पर

आखिर वो तो ‘माँ’ है न.....

उधर उन आंटी के सव्वल के जवाब में आंटी बोली--- अरे ये... ये हमारी

Maid है... Servant........

MAID, हाँ ये ही तो हूँ मैं..............

SERVANT, अपने माँ बाप का सपना..................

KissaKriti | क्या यही है मेरी पहचान
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