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इन्साफ
July 5, 2017 | Surendra Arora






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बड़ी ईमानदारी से की गयी बहुत दिनों की काजीगिरि के बाद भी छह बच्चों और जवान बीबी वाली गृहस्थी अपने ढर्रे पर नहीं आ रही थी . हाँ बड़े वाले ने जब से कबाड़ का काम हाथ में लिया है , उम्मीद है कमसे कम रोटी का जुगाड़ तो हो ही जायेगा . वरना इस जवान बीबी के ने तो जीना मुहाल कर दिया है . जब से पेट से है , नॉजों - नखरों की बरसात कर रखी है . बदजात को जरा सा भी डपटो तो ऐंठ दिखाते देर नहीं लगाती . कहती है ," अपनी सफेद होती दाढ़ी को बदरंग किया तो डाक्टरनी के पास जाकर तुम्हारी सातवीं औलाद को गिरवा देगी और जरा भी जोर - जबरदस्ती का सहारा लिया तो दरोगा को दरवज्जे पर लाकर खड़ा करने से भी नहीं चूकेगी . सारी काजीगिरी हवा होते देर नहीं लगेगी . ज्यादा से ज्यादा तलाक ही तो दे दोगे दे देना . कहीं भी बैठ कर दो रोटी ठूंस लूंगीं . " कोढ़ में खाज ये कि जब देखो तब बेवजह की नयी - नयी जरूरतें पैदा करने में भी नहीं हिचकती .
पहले वाली की तो बात ही कुछ और थी . पांच औलादे पैदा ही नहीं कर गयी . कुछ हद तक उन्हें बड़ा भी कर गयी . कर्म फूटे थे काजी मियां के कि एक रात ऐसा जिद्दी नशा सवार हो गया जिसके चलते सुबह होते - होते सब कुछ तलाक में तब्दील हो गया . उसके बाद जिंदगी तो जैसे बेजार ही हो गयी .
उसके जाने के बाद आयी एक ये है कि पहला जनने के बाद ही अपने आप को किसी नूरजहां से कम नहीं समझती .दूसरा पेट में आने के बाद से तो इसके नाजो - नखरे इस कदर बढ़ गए हैं कि घर में कदम रखने से पहले ही उनका पसीना छूटने लगता हैं . कोई काम - धाम तो क्या करना , रोटी बनाना भी मंजूर नहीं है . रोटी बनाने का काम पहले से मौजूद दोनों बेटिओं के सुपुर्द कर दिया है और फिर तुर्रा ये कि उन्हें कमाने - धमाने की नसीहतें दी जाने लगीं हैं .अब तक की सारी उम्र तो मस्जिद में बिताई है ,जिंदगी में पढ़ाई - लिखाई तो हो नहीं पायी . रोजी कमाने के नाम पर अब कहाँ जाकर पंचर का ठिया लगाया जाय . लोग मजाक बनाएंगे , कहेंगें " मियां ! काजी होकर बुढ़ापे में ये क्या सूझी मदरसे के हो , उसी में बने रहो ? "
उन्हें क्या पता कि मदरसे से सात बच्चों की गृहस्ती को किनारे नहीं लगाया जा सकता !
दिमागी तौर पर जब पूरी तरह से बेबस हो गए तो दिल हल्का करने के लिए अपनी सारी मुसीबतों का ज़िक्र अपने पुराने दोस्त राशिद भाई से कर बैठे . अंदर से कहीं आस भी उग रही थी कि इस मुसीबत से निकलने का शायद कोई रास्ता निकल आये !"
राशिद भाई को काजी मियां की तकलीफ का पता चला तो संजीदा हुए बिना न रह सके . कभी - कभार काजी मियां का हाल - चाल जानने उनके घर पर आते ही रहते थे . एक - आध बार कम्मो भाभी के हाथ की बनी चाय पी भी चुके थे और उसकी कड़क से वाकिफ भी थे .
काजी मियां की मुसीबत में उन्हें अपने लिए एक मौका नजर आया . उनकी अपनी वाली चौथी औलाद के चक्कर में अल्लाह को प्यारी हो चुकी थी और ऊसके जाने के बाद उनकी खुद की जिस्मानी जरूरते सिसक रहीं थीं . अगर काजी मियां का तलाक हो जाये तो उनके लिए रास्ता खुल सकता है .
काजी मियां के सामने उन्होंने ठंडी आहें भरीं और बोले , " मियां मामला संगीन है पर तुम उदास मत होओ . ऊपर वाला जो कुछ करता है , सोच समझ कर ही करता है . तुम्हें उसने काजी का दर्जा किसी की धौंस - पट्टी सहने के लिए नहीं दिया है . कर दो एक दिन तिया - पांचा . तलाक तो तलाक ही सही ."
काजी मियां कुछ देर तक बड़ी बेरूखी से राशिद भाई की तरफ देखते रहे . उनकी सारी कायनात वीरान थी .कुछ देर सोचने के बाद बोले , मियां अच्छा होगा कि बहरहाल तुम यहां से चले जाओ . तुम सच कह रहे हो , अल्ला मियां जो कुछ करते हैं , सोच समझ कर ही करते हैं . मैंने अपनी पांच औलादों की माँ के साथ जो नाइंसाफी की है , उसकी सजा भुगतना मेरी किस्मत ही नहीं जरूरी भी है . उसकी एवज में ही ऊपर वाले ने मुझे ये नई बेगैरत जिंदगी दी है . तलाक से तौबा .अब मेरे लिए अच्छा यही होगा कि मैं पुलिस वाले से बात करके फुट - पाथ पर कोई जगह तलाश लूं और वहां बैठ कर टायर - ट्यूब में पंचर लगाने का धंधा शुरू करूँ .

KissaKriti | इन्साफ
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