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मैं आदमी हूं शहर का
October 20, 2016 | Krishna Khati






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मैं आदमी हूं शहर का
मैं कहना तो चाहता हूं
पर शब्द समाप्त हैं...
मेरे भीतर के|
कुछ शब्द चाहता हूं...
आप से..
जो भरे हो आक्रोश से|
आखिर मैं आदमी हूं
उस शहर का...
जो लेकर खड़ा है
मोमबत्तीयॉ
अनगिनतों की भीड़ मे|
जो हर बार
इन्तजार करते हैं
उन चीखों के
�¤ �ान्त होने का
जिनकी नजरें
अन्तिम सॉस तक
इन अनगिनताे की ओर देखी थी
जो अब खड़े हैं
उन मोमबत्तीयों की रोशनी के नीचे
मूक बनकर ||

KissaKriti | मैं आदमी हूं शहर का
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