Login Sign Up Welcome
Guest




लम्हा
November 8, 2016 | Yojna Jain






Link for Book



वक़्त के दरीचों से झांकता लम्हा,
आ खड़ा हुआ सामने यूँ,
आँखों में शरारत, होठों पे मुस्कान लिए,
उसकी मुट्ठी में शायद कुछ बंद था,
मेरे दिल में एक डर था....

ना जाने वक़्त का ये कतरा किस शक्ल का हो,
परसों की तरह खुशनुमा या कल की तरह दर्दभरा,
वो मुस्काया, धीरे से मेरे पास आया, हवा की सुगबुगाहट, सुबह की पहली किरण...

मिचमिचाती आँखों से देखा मैंने उस खुलती मुट्ठी को,
कुछ नहीं, बस घडी की टिकटिक सुनाई दी....

गुजरते पल, छितरते लम्हे,
आज भी सब कुछ वैसा ही था, पहले की तरह
बस झड गया वक़्त के कैलेंडर से एक और दिन,
टूटा समय की साख से एक और पत्ता,
और मैं असमंजस के श्हितिज पे ख़ड़ी,
वक़्त के दरीचे से झांकते एक और लम्हे के इंतज़ार में........

KissaKriti | लम्हा
Likes (0) Comments (0)