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गुप्ता जी के अल्फाज
November 5, 2017 | Sachin Om Gupta






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अपने जीवन के कुछ हसीं पल को अपने शब्दों की माला में पिरो रहा था,
कुछ अनजाने आए और,
मैं सरेआम बिक गया |



तुम अपनी कहानी का बस तुम ही एक किरदार हो,
तुम ही निर्दोषी हो, तुम ही गुनहगार हो |



आखों में हो गर गुरुर तो इंसान को इंसान नहीं दिखता,
गर अपने ही मकान की छत पर चढ़ जाओ तो अपना ही मकान नहीं दिखता |



मन का क्या है, वो तो ख्वाहिशों में ही डूबा है,
जिंदगी तो डूब कर चली जा रही है |


आदमी आजाद है देश भी स्वतंत्र है,
राजा-रानी का युग गया अब तो प्रजातंत्र है |



थोड़े-थोड़े समय की मुलाकात अच्छी है सचिन जी,
महत्व व् प्रतिष्ठा खो देता है रोज का आना-जाना |


धन्यवाद्...
~सचिन ओम गुप्ता~

KissaKriti | गुप्ता जी के अल्फाज
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