Login Sign Up Welcome
Guest




काश कि मैं ...... पंछी होती.....
April 26, 2017 | Yojna Jain






Link for Book



क्यों मैं इंसा हूँ , किलस होती है
काश कि मैं पंछी होती........
काश कि मैं पंछी होती........

उडती खुले आसमां में पंख फैला,
इस डाली से उस डाली पे जा जा,
ना दूरी का डर ना सीमाओं की फिकर
बादलों को पास से मुँह चिढ़ा,
आज का बस दाना चुनती और चैन की नींद सोती
काश कि मैं पंछी होती..........

काश कि मैं मछली होती.....
रंग बिरंगे सागर वन की,
बहुत सुन्दर सतरंगी तन की,
किसी तलैया या नदिया में,
खाती हिचकोले जल के साथ मैं,
ना पाने की फिकर, न खोने का डर,
बेफिक्र आज को जीती, कल को खोती,
काश कि मैं मछली होती.....

काश कि मैं तितली होती.........
फूल फूल कभी पात पात,
कौन सा धर्म, कौन सी जात
ये भी मेरी बगिया, वो भी मेरा घर
उडती फिरती रहूँ इधर उधर,
दिन का मैं रंगीन उजाला
और रात की जुगनू ज्योति
काश कि मैं तितली होती.....
काश कि मैं तितली होती.....
क्यों मैं इंसा हूँ , किलस होती है........

KissaKriti | काश कि मैं ...... पंछी होती.....
Likes (0) Comments (0)