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नारी
May 27, 2017 | Mohan Joshi






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विकल के पूर्ण सुख-विश्रान्त , सहज सुचि भाव गुणखानी।
परमतप की सदा मूरत, तृषित हित के लिए पानी।।
तपित हित बरगदी छाया, अमर तुम प्रेम की दानी।
जगत को जन्मती काया, परहित स्नेह अवदानी।।

तुम विरह की वेदना हो ,तुम अमर संगीत वाणी।
वीर की तुम प्रेरणा नित ,तुम शक्तियों की राजधानी।।
धरा सम धारिणी दुख की, सदा नव ज्योत्सना खानी।
नारी ! प्रेममय परिपूर्ण तुम ,अधर धरती सुधा सानी।।


KissaKriti | नारी
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