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सरलता
March 18, 2017 | Om Fulara






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अरी सरलता
देख तेरा ये तिरस्कार
टूटता है दिल कई टुकड़ो में
हजारों बार
सोचता हूँ
क्यों तू अन्तर्मन में समाई
क्या कर्म के बोझ तले दबे रहना ही
हमारे किस्मत का लेख है
फ़िर भी
हर कदम पर ठुकराई गयी
हर कदम पर दुत्कारा गया
तेरे और मेरे किस्मत का खेल
एक सा है
हर ज ुल्म को सहना ही
नियति सी हो गयी है
क्यों बने एक दूसरे के साथी
क्या देखा मुझमें
जो हर पल अपमानित होकर भी
साथ निभा रही है
क्षमा करना
तेरे जीवन का मोल नही दिला पाया
सब्र रख
जन्मों का साथ है
किस मोड़ पर जीवन सँवर जाय
करनी तो अपनी करनी है
हस्र क्या होगा
न तू जान पाई न में जान पाया
रहे साथ यू ही सदा
हर घड़ी हर जनम में
कभी तो बहार आयेगी
जीवन की बगिया में

KissaKriti | सरलता
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