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वो बूरा नहीं था
October 25, 2016 | Yojna Jain






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पुराने गुडगाँव की एक तंग सी सड़क पर जाम लगा हुआ था... कृति ने अपनी गाडी मोड़ी तो दिखा “वो”.....सड़क के बीच बैठा “वो” और चारों तरफ लोगों की भीड़....

कृति के सामने ही किसी जली लाश को एम्बुलेंस में रखा गया और आस पास से आवाज़ आई.... बेटी थी इसकी.......बेचारा ...

ऑफिस के लिए लेट होती कृति की गाडी को अपने आप ही ब्रेक लग गए.....और तभी दिखा “वो” बदहवास भागता हुआ दूसरी दिशा में....

कैसे रह सकती थी कृति उसकी अनकही कहानी सुने और सुनाये बगैर...... “वो” जो कभी बूरा था पर शायद “वो” बूरा नहीं था.......

तो ये है “उसकी कहानी” “वो बूरा नहीं था” ........

वो बूरा नहीं था

भाग 1:

आवाज़ नहीं निकल रही थी मुँह से. मन कर रहा था सांस रोक ले.....कई बार कोशिश की सांस रोक के मर जाने की...... पर कमबख्त ऐसे नहीं हो पायेगा, बार बार शारीर फिर सांस को ही खिंच लेता है.. न चाह कर भी........

थूक गले से नीचे नहीं उतर रहा था, लगता था जैसे बहुत बड़ा पत्थर रखा है गले में, जो न तो सांस, न थूक को नीचे उतरने देता है...... सांसें इतनी भारी जितना और कुछ आज तक कभी भारी नहीं लगा इतनी बड़ी बड़ी हाथ गाड़ियां खींचने के बाद भी.......

उसकी बीवी चीख चीख कर, रो रो कर, जमीं पे बेसुध पड़ी हुई थी.......

मन किया जा के पकड़ ले उसे, दिलासा दे..........पर लगता है जैसे सब जाम हो गया है, शरीर हिल ही नहीं रहा........

पुलिस आ गयी है.... उसकी जवान 16 साल की बेटी को पेड़ से उतार कर ले जा रहे हैं वो...

बहुत जी चाहा कि जा के सीने से लगा ले अपनी लाडो को, नहीं ले जाने दे उसे... शायद.... शायद उसमें अभी कुछ सांस बाकी हो, शायद वो ठीक हो सके......... ले जाके तो उसे जला ही देंगे ना.... फिर तो वो मर जाएगी न... बचा ले उसे, उठ बचा ले उसे...

कैसा मर्द है रे तू.... इतना सब हो रहा है और ऐसे बैठा पड़ा है... संभाल अपनी बीवी को, अपने दूसरे बच्चे को............... उसकी माँ बोली और छाती पीट पीट के रोने लगी, गालियाँ देने लगी उन्हें जिन्होंने ये कुकर्म किया था उसकी लाडो के साथ...

पर वो तो जैसे बुत बन गया था..... कैसे गालियाँ दे......... कैसे...........
अपनी बेटी की आखिरी झलक देखी.....

और याद आ गई वो............. वो..................

भाग गया था ना उस दिन वो, उससे दूर, अपने से दूर..........
ले आ गई वो तेरे सामने........... हाहाहा
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भाग 2:

इतना भी बूरा नहीं था वो... पैदा होते तो कोई भी बूरा नहीं होता. हर एक की तरह माँ बाप का लाडला था. उनकी आँखों का तारा, घर का चिराग, हर लड़के की तरह.... मजदूर का बेटा था, पर उस दुनिया में तो लड़के ही चिराग होते हैं........ लडकियां बला और बहुत बड़ा बोझ... तभी तो उस चिराग को पैदा करने के लिए उसके माँ बापू को 5 बोझ पहले पैदा करने पड़े........
खैर अब वो आ गया तो उनका जीवन सफल हो गया......... आखिर लड़का था, बेटा, घर का चिराग..........

घर..... कैसा घर, किसका घर?............जिस घर को उन्होंने कल बना के दिया, वो गुप्ता का घर या जिस अधबने घर में वो रह रहे हैं, उस कुकरेजा का घर...........

मिटटी में खेलते खेलते, टूटे फूटे खिलोनों से, वो लकड़ी का टुल्लू, जिसे चला के बहुत मज़ा आता था.........

बगल के घर में एक बड़ी लड़की थी,.... खुले में ही नहाती थी, कपडे पहन के... पर उसे देखना अच्छा लगने लगा था... 10 साल का ही था, चुप चुप के देखता था उसे.
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आजा कंचे खेलेंगे और सुट्टा भी लगायेंगे ............ नए शहर में आ गया था उसका परिवार .... अब सुट्टा लगाने से उतना डर नहीं लगता, ना उतनी खांसी आती थी उसे, जितनी 1 महीने पहले आती थी. धीरे धीरे आदत हो गई थी और अच्छा भी लगने लगा था... जहाँ उसकी बहनों ने आस पड़ोस के घरों में जाके छुट्टा काम पकड़ लिया था झाडू पोंछे का ..... उसने यानी घर के चिराग ने नयी नयी आदतें शुरू कर दी थी... सुट्टा लगाना, घर से भाग जाना, पैसे चुरा लेना, ये तो शुरुआत थी....

पर वो बूरा नहीं था.... क्योंकि पैदा होते तो कोई बूरा नहीं बनता... बहुत सालों की मेहनत लगती है किसी को बूरा बनने में........

और आज उसने एक नयी आदत सीखी........ दारु.......पढाई में तो मन लगा नहीं... लड़कियों को नहीं भेज सकते थे स्कूल पर उसे भेजा उसके माँ बाप ने..
जहाँ से आये दिन भाग के नयी नयी आदतें सीखता था वो ..............

चंदू ने कहा , आज रात को हम जायेंगे बड़े शहर, सिनेमा देखेंगे और फिरर... फिर क्या.. ऐसे मज़े लेके क्यों बोल रहा है.....?

अरे भाई, वहां चलेंगे वहां... चंदू बोला...... उसससस इलाके में.... चलेगा....?

15 का था शायद उस समय वो ... मना किया पहले उसने...... माँ बापू डांटेंगे..

पर..... पर...साले मर्द बन अब..... चंदू फिर बोला...... तो वो गया उस रात......

मर्द तो नहीं बन पाया उस रात, पर हाँ ..... अच्छी लगने लगी लडकियां और औरतें............
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भाग 3:

छोटी सी प्यार सी लड़की थी वो! होगी शायद 13-14 साल की........गाँव आये हुए थे वो लोग कटाई के टाइम पे..... पूरा कुनबा चला जाता है वापस गाँव, दशहरा दिवाली के टाइम पे........

पास के दूसरे गाँव में दिखी थी वो लड़की .... फिर तो उसने अपने 1-2 और दोस्तों को साथ ले कर हर दूसरे दिन बहाना बना के उस गाँव में जाना शुरू कर दिया......... वो राशन लेने लाला की दूकान पे जाती और वो 2-3 दोस्त चाय की दुकान पे खड़े रहके उसे देखते... उसने पहले तो मना कर दिया था पर श्याम और बबलू ने उस लड़की का पीछा करना शुरू कर दिया तो उसे भी साथ होना ही पड़ा...

आखिर मर्द बनना था न................

सीटी बजाना आता था उसे ...... माल है, क्या चाल है........ मुझसे दोस्ती करोगी....... आ गले लग जा.... ये सब आपस में बोलते थे वो लोग उसका पीछा करते करते........

मजदूर की बेटी थी वो, उसकी ही बहनों की तरह............. हाँ शायद बाप मर गया था उसका और माँ के साथ रहती थी... किसी शहर में ही काम करती थी और यहाँ आई हुई थी अपने गाँव आजकल........

10 दिन हो गए.. बहुत तंग किया, छेड़ा उसे.... बड़ा मज़ा आता था उन सब दोस्तों को लड़कियों को छेड़ने में भी और उसके बाद सब दोस्त मिल के सुट्टा लगाते हुए या दारु पीते हुए जो हँसते थे....

वाह! यही तो असली मज़ा था जवानी का........

पर खैर इतना बूरा नहीं सोचा था उसने....... सच में, इतना बूरा नहीं था वो....
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भाग 4:
शहर वापस जाने में बस कुछ ही दिन बचे थे.... शायद उससे प्यार हो गया था उसे... पाना चाहता था उसे...

आखिर एक शाम उन तीनों दोस्तों ने खेतों के पास उसको रोक ही लिया......

शाम को ही पी ली थी और होश नहीं था............... ज्यादा लोग भी नहीं थे आस पास.............

करना नहीं चाहते थे, पर हो गया बस...........

वो चीखती रही और उन्हें उतना ही मज़ा आता रहा..............

बुरे नहीं थे वो, बस लड़के थे..... जवान लड़के जो मर्द बनना चाहते थे..... ऐसा क्या गलत था... और उस ज़माने में तो ज्यादा हो हल्ला भी नहीं होता था........

उसको उसी हालत में छोड़ के आराम से चैन की नींद सोये वो उस रात ...........
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भाग 5:
वो आराम से सोया पड़ा था..... उठ के अंगडाइयां लेकर खाट से उठा...

तभी चंदू दौड़ता हुआ आया.... भाई कांड हो गया है... क्या हुआ?

यार उस लड़की ने, तेरी रात वाली ने.... लटक गई वो पेड़ से...

क्या..???

हाँ यार और उसकी माँ ने भी जहर खा लिया है..........

खबर सुनते ही, वो सर पकड़ के बैठ गया............ ....... दोस्तों ने मना किया पर उसे तो प्यार था न उससे शायद तो वो गया उसे देखने...

नीलू नाम था उसका........ उसके सामने ही उसे पेड़ से उतार कर ले जा रहे थे वो लोग.......एक झलक ही देख पाया उसे ले जाने से पहले....................

वो इतना बूरा नहीं था शायद इसीलिए आज भी उसकी शकल याद थी उसे.. आज भी वो हादसा याद था ......
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भाग 6:

आज एक दफ्तर में चपरासी है .... इज्जत की नौकरी है, एक किराये का घर है शहर में......... आखिर माँ बाप का लाडला और घर का चिराग जो है ...........

घर में लड़की हुई... आजकल के जमाने में तो क्या बात है............ ये हमारा भविष्य बनेगी....... इसे खूब पढ़ाएंगे साहब लोगों के जैसे...... बहुत लाडली थी वो उसकी .... प्यारी बच्ची..... गुडिया रानी, उसकी लाडो थी वो ...

अपनी माँ से ज्यादा मुझसे चिपक के रहती है ....कहता था वो ....

छुट्टी वाले दिन उसे जलेबी खिलने ले जाता था.....

अब बड़ी हो रही थी तो स्कूल जाने के लिए एक साइकिल भी दिला दी थी... अच्छी है पढाई में, खूब बड़ी बनेगी मेरी बिट्टो............
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और आज........ उसकी फूल सी बच्ची की लाश जो ये लोग लेके जा रहे हैं............... जली हुई, एसिड से जली हुई लाश, जिसे वो चाह कर भी उठ कर देखने की हिम्मत नहीं कर पा रहा...... बदन जवाब दे गया है... आंसूं सूख से गए हैं....... लकवा मार गया है शायद बदन को.... या शायद दिमाग को.........
एक बार वो लेके आये उसकी बच्ची की लाश उसके सामने, आखरी बार उसे पोस्त्मर्तुम के लिए ले जाने से पहले.................

और ये क्या..........................वो उसकी बिट्टो नहीं है.... नहीं है, मेरी बिट्टो ..............वो तो नीलू है... हाँ वो नीलू है..... अचानक से वो चिल्लाया...... और भागने लगा .....तेज़ तेज़ और तेज़............. दूसरी दिशा में...........जहाँ से उसे वो चहेरा दिखाई ना दे, कभी दिखाई ना दे...........................

और गुम हो गया “वो” एक काले अँधेरे में जहाँ नीलू नहीं थी...........!!!!!

समाप्त

KissaKriti | वो बूरा नहीं था
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