Login Sign Up Welcome
Guest




नेह के धागे
June 30, 2017 | Jyotsna Kalkal






Link for Book



***
हर लफ़्ज़ में कोई
कहानी हो जैसे
मेरे अल्फ़ाज़ यूँ
दिल में संजोए हो ना
मुझसे उलझे
तो कोई बात नहीं
खुद से लड़कर
ज्यादा रोए हो ना
उससे जरूरी काम
और बहुत हैं
रात तकिए को
ये कहकर सोए हो ना
कई बार सुनी
आहट तुम्हारी
तुम आए
फिर लौट गए हो ना
ओस में गीला है
सारा आँगन मगर
मेरी चौखट को
तुम ही भिगोए हो ना
चाँद थोड़े ही हो
जो तुम्हे पाने को मचलें
ग़ुरूर में खामखाँ
खुद को डुबोए हो ना
हर लम्हा साथ लिए
फिरते हो मुझे
कहो अब भी मुझ ही में
खोए हो ना
सुनो,बिछड़ने का ख़्याल
बिखरा देता है मुझे
तुम नेह के धागों में
कसकर पिरोए हो ना

ज्योत्सना कलकल

KissaKriti | नेह के धागे
Likes (2) Comments (0)