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परछाई
July 3, 2017 | Ankit Tiwari






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परछाई हूँ,
परछाई बनने से डरती हूँ।।

नित्य नवीन संबंधों में पिसकर,
हर पल बदलने से डरती हूँ।
कभी छोटी बड़ी कभी गायब होकर,
नवीन सम्बन्धों की भेंट चढ़ने से डरती हूँ।।

शरीर होकर भी परछाई बनकर,
घुट-2 मरने से डरती हूँ।
घर-बाहर हर ओर असुरक्षित,
किसी कोने में सिमटने से डरती हूँ।।

समाज के अंधियारी गलियों से होकर,
निशा में घर से निकलने से डरती हूँ।
हर ओर हर तरफ की नज़र से सहमकर,
भरी दुपहरी मिटने से डरती हूँ।

परछाई हूँ,
परछाई बनने से डरती हूँ।।

।।अंकित तिवारी।।
©

KissaKriti | परछाई
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