Login Sign Up Welcome
Guest




कविता
July 5, 2017 | Yojna Jain






Link for Book



कहते हैं लोग
क्या लगता है
कविता करने में
कैसे बनती है कविता
जवाब देने का प्रयास ....
बहुत घुलता है ये दिल
बेहद मचलता है ये दिल
पिसता है मसलता है
कभी दहकता कभी महकता
घिस घिस के तेज़ आँच में
तपता है ये दिल ....
तब कहीं जाकर, होकर गुलज़ार
कभी बेअदब, कभी बेख़याल
बारिश सी छनती है
मोम सी पिघलती है
फिसलती है संभलती है
और फिर बमुस्क़िल
रूह से काग़ज़ पे उतरती है!
करके मुझे मुझसे कहीं विशाल
मेरे अंदर बाहर तनती है।
जब मुझमें मैं नहीं होती
तब ये कविता बनती है ।

KissaKriti | कविता
Likes (0) Comments (0)