Login Sign Up Welcome
Guest




*** बस शर्त इतनी है ***
January 11, 2018 | Sachin Om Gupta






Link for Book



जिन्दा रिश्तों को जब भी संभाला जाए,
बस शर्त इतनी है की गड़े मुर्दों को उखाड़ा न जाए |

मेरी बदनामी का किस्सा बेशक उछाला जाए ,
बस शर्त इतनी है की मेरी नेकचलनी को भी सामने लाया जाए |

पत्थर के देवता का भोग बेशक निकाला जाए,
बस शर्त इतनी है की गरीब के मुँह में भी निवाला जाए |

साल की हर अमावस को दीवाली का त्योहार बना डाला जाए,
बस शर्त इतनी है की अँधेरे झोपड़ो में भी उजाला लाया जाए |

घर में कुत्तों को बेशक बच्चों की तरह पाला जाए ,
बस शर्त इतनी है की बूढ़े माँ-बाप को घर से निकाला न जाए |

मैं कहता हूँ ये मुर्दा जिस्म बेशक मेरा फूँक डाला जाए,
बस शर्त इतनी है की इसमें से मेरा जिन्दा दिल निकाला जाए |

धन्यवाद् ...
(सचिन ओम गुप्ता, चित्रकूट धाम)

KissaKriti | *** बस शर्त इतनी है ***
Likes (0) Comments (0)