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टीस
August 13, 2017 | Jyotsna Kalkal






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*** टीस

रेड सिग्नल पर रुकी
खड़ी है मेरी गाडी,
जा टिकीं तिरंगे पर निगाहें
जो घुमाई तिरछी आड़ी।
हाथों में संभाले
हिंदुस्तान का मान,
दौड़ रहे हैं बच्चे
बेचने को सामान।
कुछ सड़क के इस तरफ़,
पांच छः उस पार हैं
वो प्यारे नौनिहाल देशप्रेम का जज़्बा जगानेे को तैयार हैं।
बिखरे बालों वाला एक लड़का
दौड़ कर मुझ तक आया,
तिरंगा बढ़ा कर आगे
खिड़की का शीशा खटखटाया।
कुछ सोचकर मैंने
गर्दन ना में घुमा दी,
उसे अनदेखा सा कर
नज़र ट्रैफिक सिग्नल पर गड़ा दी।
सामने भी दिख रहे हैं
तीन रंग,
सरपट भागती ज़िन्दगी के
अभिन्न अंग
रुको, देखो और फ़िर चलो,
समय के अनुरूप संयम से ढलो।
मगर हम तो तरक्की की दौड़ में,
चले जा रहे हैं बस अंधी होड़ में।
थमना हो जैसे कोई मज़बूरी,
या अनायास घट जाए कुछ जरूरी।
दिल की आवाज़ न सुनते हैं
न किसी को सुनाते हैं ,
खुद में ही इतना उलझे हैं,
औरों तक पहुँच नहीं पाते हैं।
बापू के बंदर बनकर
सीख यूँ अपनाते हैं,
ज़मीन पर गिरा हो इंसान
तो भी नहीं उठाते हैं।
कुछ देर नमन कर शहीदों को
हम जैसे फ़र्ज़ ही पूरा करते हैं,
लोकतंत्र को शायद न समझें,
हमसे ज़्यादा ये मासूम
झंडे की कद्र समझते हैं।
हर गाड़ी के पास जाकर रुकते उस बच्चे को
फ़िक्र है दो रुपये कमाने की,
और मुझे तकलीफ़
अगले दिन
तिरंगे को सड़क पर पड़ा ना देख पाने की।

ज्योत्स्ना कलकल

KissaKriti | टीस
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