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" गरीबी "
January 11, 2018 | Sachin Om Gupta






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जीवन की इस तपन को मैं रोज महसूस करता हूं,

आओ आज मेरे साथ मैं तुम्हें गरीबी से मिलाकर लाता हूं|



कैसा भी हो संघर्ष हम कभी पीछे हटेंगे नहीं,

जैसा भी हो समय हम कभी उससे डरेंगे नहीं|



दुनिया के इस रंग मंच में हमने क्या जुर्म किया,

भूख से तड़पती विचारी 'फुलवा' को गरीबी ने मार दिया|



शहर की इस भीड़ में साहब हम भी थोड़ी इज्जत रखतें हैं,

कपडा भले ही फटा हो पर सिर पर पल्लू रखतें हैं|

जीवन की इस तपन को मैं रोज महसूस करता हूं,

आओ आज मेरे साथ मैं तुम्हें गरीबी से मिलाकर लाता हूं|



पूछतें रहते हैं मुझसे लोग अक्सऱ एक ही सवाल,

कैसी है बताइए हमें जमुना पार की फुलवा का हाल|



तरस रहें हैं गरीब, शरीर पर चंद कपड़ो के लिए,

बेच रही हैं जिस्म कितनी ही फुलवा रोटी के लिए|



आज गरीब अपने बच्चों को फटा कपड़ा भी नही पहना पा रहा है,

जहाँ आज अमीर फटी जीन्स को पहनकर उसे फैशन बता रहा है|



टूट जाता है गरीबी में वो रिश्ता जो खास होता है,

हजारो यार बनते हैं जब पैसा पास होता है|

जीवन की इस तपन को मैं रोज महसूस करता हूं,

आओ आज मेरे साथ मैं तुम्हें गरीबी से मिलाकर लाता हूं|



मैं आपको निमंत्रण दे रहा हूँ, आओ मेरे गाँव में,

कुछ पल बिताएंगे इन गरीबो की बस्ती की छांव में|



वो आज फिर मुझ पर एक कर्ज चढ़ा गया,

कुछ भी न मिलने पर वो गरीब मुझको दुआ दे गया|

कुछ भी न मिलने पर वो गरीब मुझको दुआ दे गया|



धन्यवाद...














KissaKriti | " गरीबी "
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