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April 5, 2017 | Deep Chandra Pandey






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शब्दों की सुंदर माला पिरो कर,
भावनाओं की मधुर चाशनी में डुबो कर,
सोचा था एक प्यारी सी कविता लिखूं।
मैं भी नामाचीन कवि बन जाऊं।
किन्तु,न अल्फाज ही मिले,
न जज्बात ही जगे।
खो गई है मेरे हर्फ़ों की चमक,
जीवन की रेलमपेल में।
सम्वेदना शून्य सा हो गया हूं मैं,
नून तेल रोटी की तलाश में।
दफन हो गए हैं मेरे जज्बात,
दिल की गहरी शांत कब्र में।
उहापोह में हूँ, देख रहा हूँ जीवन प्रवाह।
वीरानी सी छाई है इस चराचर जगत में।
जहाँ इंसानियत का दम घुट रहा है,
अपने पराये का कोई भाव नहीं है।
स्वार्थ का घिनौना तांडव मचा है।
लोभ मोह में अंधे है सब,
जीवन में राग नहीं,रंग नही।
यंत्रचालित रोबोट से हो गए हैं हम सब।
सुप्त हो चुकी हैं कल्पना की उड़ान।
सूख चुका ह भावना का उद्वेग।
बस चल रही है लेखनी,
जीवन के कोरे कागज पर,
शायद कभी तो इस मरुभूमि में बहार आएगी।
भावनाओ के सोते प्रस्फुटित होंगे।
देर से ही सही मेरी एक नई कविता रंग लाएगी।

दीप पांडेय
बागेश्वर

KissaKriti | चाह
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