Login Sign Up Welcome
Guest




अखंड भारत की ओर
April 9, 2017 | आलोक पाण्डेय






Link for Book



आघातोँ की राहोँ मेँ
सुन्दर मुस्कान बढाता जा,
राष्ट्रदूत हे वीर व्रती
भारत को भव्य सजाता जा,
सुस्थिरता को लाता जा ।
अगणित कर्तव्योँ के पुण्य पथ पर
शील, मर्यादाओँ के शिखर पर
धन्य ! स्वाभिमानी वीर प्रखर
सतत् रहे जो निज मंजिल पर ।
वसुधा की विपुल विभूति तू
विजय का हर्ष लाता जा
सबकी पहचान बनाता जा ।
उपवन कितने हैँ लूट चूके
पथ कंटक कितने शूल टूटे
भारत का अखंड रुप ले
कितने अगणित उद्गार फूटे।
जो कुछ भी हो, जग मेँ,
सबको दिलासा दिलाता जा
हे भारत के राष्ट्रदूत
भू, पर व्योम सुधा बरसाता जा ।
महाप्रलय की आफत हो,
सौ-सौ तूफान उठेँ क्षण-क्षण मेँ;
आक्रांता मेँ वीर ह्रदय हो
गहरी चोटेँ हो सीने मेँ।
असह्य वेदना छोड़ जीवन के
नंगी खड्ग उठाता जा
जो हो शोषित,व्यथित,कंपित
उनको मंजिल पहुँचाता जा ।
सपनोँ मेँ भारत वंदन हो
भूखोँ मरना हो जीवन मेँ,
चाहे कितना भी क्रंदन हो
आग लगी हो निज भवन मेँ ।
देशद्रोही, के आगे अपना मस्तक,
कभी न झुकाता जा
हो सर्वनाश की टक्कर निरंतर
पुनः अखंड भारत बनाता जा ।
अखंड भारत अमर रहे
वंदे मातरम् ।


KissaKriti | अखंड भारत की ओर
Likes (1) Comments (0)